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कभी मैं भी बदलूंगा !

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कभी मैं भी बदलूंगा !

हर दिन वही  कहानी,
आज तो मैं ऐसा करूँगा,
अब से वैसा नहीं करूँगा,
पर शाम आते-आते,
हम हैं अक्सर खुद को वहीँ पाते।
 
क्यूँ मैं गलती दोहराता हूँ?
क्यूँ फिर उसी रास्ते जाता हूँ?
यह सोच सोच होकर परेशां,
फिर उलटी करवट ले सो जाता हूँ!
 
एक बार फिर नई सुबह आती,
विश्वास पहले से कम पर उम्मीद बढ़ जाती,
कल भले न सही आज कुछ अलग करूँगा,
मन में अब भी है विश्वास, कभी मैं भी बदलूंगा!
 
-पियूष

निर्दोष पशु करें पुकार, बंद करो ये मांसाहार!

Following lines shows my views towards non-vegetarianism. I dont intend to hurt anyone and these are just my personal views. I am sure a lot people can identify with my views and a lot of you wont. If you are sensitive, please stop reading here itself. Also, I dont intend to have any discussion/argument on this post so please refrain from doing the same.

सुखी जीवन तू चाहे, सुखी जीवन वे चाहें |
नर और जानवर की एक ही तो चाह है |
ऊन देते, दूध देते, तेरे लिए खेत जोतें,
बदले में उन्हें दी क्यूँ मौत की कराह है ?

तेरी बीवी तेरे बच्चे, जैसे लगते तुझे अच्छे|
कह न सकें भले मुंह से, उनकी भी यही चाह है|
उन्हें पालता है पोसता है, भोजन परोसता है,
इन पर तू बस दया कर, इसी में तेरी वाह है|

सब माने सब जाने, उनके दुखों को पहचाने,
उन्हें खाने के जो ये तेरे परिणाम हैं|
ये मनुष्यों के हैं नहीं, और पशुओं के भी नहीं,
निर्दयी और नृशंस हत्यारों के ये काम हैं!

माता अपनी संतान को चाहे खुद से भी ज्यादा,
चोट लगे पुत्र को, निकलती माता की भी जान है|
उस पशु की भी माता थी, माता थी और पिता थे,
जिस पशु का मांस खाकर, तूने बड़ाई अपनी शान है|

गाय को तू पूजता है, मांस उसका छोड़ता है,
बाकी पशुओं ने क्या, किया कोई गुनाह है ?
स्वार्थी है लालची तू, गाय में भी लाभ देखता है,
छोड़ा उसे क्यूंकि बिन गाय मुश्किल निर्वाह है!

एक दिन शाकाहारी, एक दिन मांसाहारी,
ढोंगी तेरे पाखंडो की, क्या कोई मिसाल है ?
है जो आज सही कल सही, आज गलत कल गलत,
पशु ने है जान खोई, भले हुआ हलाल है|

बेड काऊ मेड काऊ(Mad Cow) बर्ड फ्लू- Swine फ्लू,
शायद ये बीमारियाँ, मांसाहार का ही परिणाम हैं|
ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही, प्राकृतिक संपदा घट रही,
ऐसे इन कुकृत्यों का, शायद यही अंजाम है|

पीड़ा समझ पशुओं की, छोड़ दे तू मांसाहार,
सारे ये पशु-पक्षी, तुझसे कर रहे पुकार हैं|
पशु नहीं साग-सब्जी, समझोगे तुम ये कब जी ?
जिसने समझा, दया को धारा, वही तो दिलदार है|

पियूष

fir wahi zindagi – फ़िर वही ज़िन्दगी

….while cleaning my flat came across few notebooks which i preserved till now, went through them and found this poem 🙂 btw donno why i wrote this 😀 bcoz nothing mentioned below actually happened..pure imagination 😀 btw i found one more which is half completed will finish it soon !

कर के वादे कई,
वो मुकर जाते हैं।
फ़िर याद आती हैं क्यूं,
उनकी वो बातें हैं?

कहती वो क्यूं थी,
चाहती मैं हूं तुम्हे।
याद आते हैं क्यूं,
बीते वो लम्हे?

चाहता मैं हूं तुम्हे,
ना रहूं बिन तेरे।
फ़िर क्यूं तोडे तूने,
प्यारे अरमान मेरे?

ना कभी भी मैनें,
तुझको गम है दिया।
तुझको चाहा मैनें,
बस तुझी को जिया।

गर वो भूले हमें,
और वो वादे किये।
जी लेंगे बिन उनके,
जैसे अब तक जिये!

जय जिनेन्द्र !
पियूष

Talaash – तलाश

कभी किसी की तलाश में,
कभी किसी की आस में ।
हर पल तडपता रहा,
इस ज़िन्दगी उदास में ।

उसे देखता तो सोचता,
वो है बनी मेरे लिये ।
चाहे यही वो, सोचकर,
जलते रहे दिल में दिये ।

दिन गुज़रे, महीने गुज़रे,
और गुज़रे चारों साल ।
पर कह ना सका उसे देखकर,
अपने दिल का हाल ।

कुछ दुख हुआ, पर फ़िर लगा,
जो हुआ, शायद सही ।
उसे भूलकर आगे बढा,
पर हसरतें फिर भी रहीं ।

अब फ़िर किसी को ढूंढता हूं,
अब फिर किसी की है तलाश ।
कोई होगा तो कहीं,
इस दिल को है अब भी आस !

अब फ़िर किसी की तलाश में,
अब फ़िर किसी की आस में ।
अब फ़िर तडपता है ये दिल,
इस ज़िन्दगी उदास में !

जय जिनेन्द्र,
पियूष !

Rishtey – रिश्ते

कोशिश करता हूं,
कि रिश्तों को बनाकर चलूं ।
नये मज़बूत रिश्ते बनाऊं,
जब नये लोगों से मिलूं ।

रिश्ते बहुत ज़रूरी हैं,
जीवन के हर पल में ।
खुशियों को बांटने में,
दुखों को हल्का करने में ।

जब एक रिश्ता बनाता हूं,
तो सोचता हूं,
रिश्ता बनता है विश्वास पर,
सम्मान पर समर्पण पर।

आशा नहीं करता अपमान की,
स्वार्थ की मायाचारी की ।
पर जब आते हैं ऐसे क्षण,
रिश्ता लगता है बीमारी सी ।

जीवन ज्यादा तो नहीं देखा,
और ना ही ज्यादा रिश्ते ।
पर देखा है कई लोगों को,
इन रिश्तों के पाटों में पिसते ।

उन लोगों में शामिल रहा हूं,
मैं भी अक्सर, कई बार ।
कभी हुई गल्तियां मुझसे,
तो हुई गल्तियां कभी उस पार ।

कुछ रिश्ते टूट गये,
कुछ में आ गई दरार ।
पर दोनों ही स्थितियों में,
खोया कुछ दिल का करार ।

जानता हूं रिश्ते जरूरी हैं,
रिश्तों से जीवन सजता है ।
पर फिर टूट न जाएं सोचकर,
रिश्ते बनाने से डर लगता है !

पर फिर टूट न जाएं सोचकर, रिश्ते बनाने से डर लगता है !

जय जिनेन्द्र,
पियूष

सफ़लता

सफ़लता क्या है ?

क्या सफ़लता है,
बेहिसाब पैसे कमाना,
अथाह सम्पत्ती जमा करना,
ढेरों नौकर चाकर होना,
लोगों पर रुतबा होना ??

या सफ़लता है,
निश्चिंत जीवन के अनुकूल साधन होना,
लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना,
उनका सम्मान पाना,
सन्तुष्टि होना,
मानवता को कायम रखना,
और परिवार में harmony होना?

मुझे तो दूसरी ठीक लगती है ।

जय जिनेन्द्र !
पियूष !

आखिर क्यों YSR ??

My reflection/reaction/state on Andhra Pradesh CM YSR’s sudden demise and the state holiday following that.

थोडा वक्त तो हो ही गया,
इस नये शहर में आए हुए ।
यहाँ अक्सर वक्त कटता है ऑफ़िस में,
या घर पर खाते या सोते हुए ।

यहाँ रश ज्यादा रहता है,
जिन्दगी थोडी तेज़ चलती है ।
इस रश और शोर-शराबे में ही,
जिन्दगी अब पूरी सी लगती है ।

आदत सी पड गयी थी मुझे,
यूँ ही ऐसे ही जीने की,
मन मारकर बडी मुश्किलों से,
दबा दी थीं हसरतें सीने की ।

लेकिन आज कुछ अधूरापन सा है,
अकेलापन फिर महसूस हुआ ।
हर तरफ सन्नाटा सा है,
ना कोई बहस ना ही दुआ ।

निकल पडा मैं सडक पर,
कि बहला दूँ अपने मन को ।
देखकर बाहर की दुनिया,
दूर कर दूँ इस अकेलेपन को ।

पर आज बाहर भी कोई नहीं,
अब ये दर्द-ए-दिल किससे कहें ?
क्यों YSR क्यों,
आखिर क्यों तुम नहीं रहे ??

नमस्ते,
पियूष

PS: I am not a YSR fan and all but its just this current state that caused all these feelings and this poem 🙂