Archive | August 2014

सरल या सफल?

असाधारण बनो, असाधारण बनो, असाधारण बनो
सुन सुन कर पक चुका हूँ मै।
साधारण ही सही, मै जैसा हूँ मैं वैसा हूँ,
कह कह कर थक चुका हूँ मै।

मै चालाकी कर सकता हूँ
मै बेईमानी भी कर सकता हूँ।
मै निष्ठुर भी हो सकता हूँ
पर, एक छोटा सा डर रखता हूँ।

मै सोचता हूँ की
क्या ये सब करना वाकई ज़रूरी है?
या फिर इस स्वार्थी, निर्दयी समाज की
चलती आई रीति की मजबूरी है?

मुझे अगर लाभ कुछ कम हो
और सम्मान में कुछ कमी हो।
बेहतर लगता है इससे कि
बाहर मै त्यौहार पर मन मै गमीं हो।

गर मन मार कर और ज़मीर को दबाकर
जिस किसी तरह से सफल हो भी गया
मै मै न रहूँगा, मै सरल न रहूँगा

-पियूष

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कभी मैं भी बदलूंगा !

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कभी मैं भी बदलूंगा !

हर दिन वही  कहानी,
आज तो मैं ऐसा करूँगा,
अब से वैसा नहीं करूँगा,
पर शाम आते-आते,
हम हैं अक्सर खुद को वहीँ पाते।
 
क्यूँ मैं गलती दोहराता हूँ?
क्यूँ फिर उसी रास्ते जाता हूँ?
यह सोच सोच होकर परेशां,
फिर उलटी करवट ले सो जाता हूँ!
 
एक बार फिर नई सुबह आती,
विश्वास पहले से कम पर उम्मीद बढ़ जाती,
कल भले न सही आज कुछ अलग करूँगा,
मन में अब भी है विश्वास, कभी मैं भी बदलूंगा!
 
-पियूष