Archive | May 2010

समय का सामना (Samay ka Saamnaa)

Whether its reaching railways station or submitting the assignments or be it anything i try to do it at the last moment… making it a risky affair.. following lines are written wondering why do i do the same..

जीवन की आपाधापी में,
हर दिन की कूदा-फ़ांदी में ।
जीवन जीने को समय नहीं,
इस समय की चलती आंधी में ।

रह रह कर क्यूं चंचल मन में,
कुछ यूं सुरूर सा चढता है ?
सीमा ये समय की परखने को,
क्यूं अक्सर आगे बढता है ?

पता है रुकता समय नहीं,
भले राजा चाहे या ही मुनी ।
पर जब जब आये ऐसे क्षण,
मैनें क्यूं है मन की सुनी ?

यूं तो पा सकता था मैं,
समय से कुछ पहले भी ।
और निश्चेत जा सकता था में,
अन्तेम क्षण के पहले ही ।

अन्तेम क्षण में जाने को,
और अन्तेम क्षण में पाने को ।
क्या मिला मुझे कुछ और नहीं,
अभेमान का विषय बनाने को ?

सीमाओं से टक्कर लेकर,
क्या समय जीतना चाहता हूं ?
या बस मित्रों के समक्ष,
शेखी बघारना चाहता हूं ?

या आदत हो गयी मुझको,
हर कार्य में बाधाओं की ?
और पाया लगे ना पाया सा,
गर पाया बिन बाधा के ?

पियूष !

PS : The example of submitting assignment may not be very correct in this context bcoz we submit it late as we have to wait for the original copy to get made 😛
PS2: Sometime back saw a Telugu flick “Kick”… wondering does it give a “kick” to do things at last moment & making it risky ?

Piyush
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