Archive | March 2010

fir wahi zindagi – फ़िर वही ज़िन्दगी

….while cleaning my flat came across few notebooks which i preserved till now, went through them and found this poem 🙂 btw donno why i wrote this 😀 bcoz nothing mentioned below actually happened..pure imagination 😀 btw i found one more which is half completed will finish it soon !

कर के वादे कई,
वो मुकर जाते हैं।
फ़िर याद आती हैं क्यूं,
उनकी वो बातें हैं?

कहती वो क्यूं थी,
चाहती मैं हूं तुम्हे।
याद आते हैं क्यूं,
बीते वो लम्हे?

चाहता मैं हूं तुम्हे,
ना रहूं बिन तेरे।
फ़िर क्यूं तोडे तूने,
प्यारे अरमान मेरे?

ना कभी भी मैनें,
तुझको गम है दिया।
तुझको चाहा मैनें,
बस तुझी को जिया।

गर वो भूले हमें,
और वो वादे किये।
जी लेंगे बिन उनके,
जैसे अब तक जिये!

जय जिनेन्द्र !
पियूष