Archive | August 2007

क्या सच में हम स्वाधीन हैं ?

भाषा सीखें हम गोरों की,
सेवा करें हम औरों की ।
भ्रष्टाचार में हम प्रवीन हैं,
क्या सच में हम स्वाधीन हैं ?

जीवन में मूल्य नहीं शेष,
बढ रहा आज है द्वेष क्लेश ।
निज सेवा में ही लीन हैं.
क्या सच में हम स्वाधीन हैं ?

पश्चिम को है सब्की दौड,
नीचे गिरने की मची होड ।
शाषक स्वयं पराधीन है,
क्या सच में हम स्वाधीन हैं ?

लगता अच्छा अब पिज़्ज़ा कोक,
माना नहीं कोई रोक टोक ।
पर हुए राष्ट्र श्रमिक श्रमहीन हैं,
क्या सच में हम स्वाधीन हैं ?

सन्स्कार गर रख सके विशेष,
हो राष्ट्र प्रगति बस एक उद्देश्य ।
हो अपनी भाषा और अपना भेष,
ना कोई अवगुण यदि रहे शेष,
बस भक्ती प्रेम में तल्लीन हों,
तब सच में हम स्वाधीन हों ।

तब सच में हम स्वाधीन हों ।

नमस्ते,
पियूष जैन

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